A.P.J Abdul Kalam (ए.पी.जे. अब्दुल कलाम) हमारे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक हैं जो भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका पूरा नाम है अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम।
वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं फिर भी विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण इतने लोकप्रिय रहे कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा की बात थी। कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी सब कुछ आसान और सहज हो जाता है।
डॉ. कलाम इस बात को चरितार्थ करते हैं। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित नागरिक हैं और इनकी जीवन-गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है।
चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए ‘एक आदर्श’ बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।
डॉ कलाम के जीवन में मील के पत्थर
डॉ. कलाम को भारत के सैटेलाइट लांच वेहिकल (एस.एल.वी.) परियोजना का प्रबंधक बनाया गया। परियोजना प्रमुख के रूप में नामांकित करना एक सम्मान भी था और चुनौती भी थी।
एस.एल.वी.-3 परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक भरोसेमंद प्रमोचन यान विकसित करना था जो चालीस किलोग्राम के एक उपग्रह को पृथ्वी से 400 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित कर सके। इसमें एक बड़ा काम था यान के चार चरणों के लिए एक रॉकेट मोटर सिस्टम का विकास।
हाई एनर्जी प्रोपेलेंट के इस्तेमाल में सक्षम रॉकेट मोटर सिस्टम में इस्तेमाल के लिए 8.5 टन प्रोपेलेंट ग्रेन निर्मित किया जाना था। एक अन्य कार्य था नियंत्रण तथा मार्गदर्शन। यह एक बड़ी परियोजना थी जिसमें दो सौ पचास उप-भाग और चालीस बड़ी उपप्रणालियाँ शामिल थीं।
सभी गतिविधियों में तालमेल बैठाना और टीम का कुशल नेतृत्व करना डॉ. कलाम के लिए एक चुनौती थी। अंततः कड़ी मेहनत के बाद 18 जुलाई, 1980 को सुबह आठ बजकर तीन मिनट पर श्रीहरिकोटा रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से एस.एल.वी.-3 ने सफल उड़ान भरी। इस परियोजना की सफलता ने डॉ. कलाम को राष्ट्रीय पहचान दी। इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 1981 को ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया।









Leave a Reply