भोपाल। समाज में बदलाव लाने के लिए केवल बड़ी बातों की नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। इस बात को मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा कस्बे में रहने वाले 21 वर्षीय युवा सुरेंद्र सिंह चौधरी ने साबित कर दिखाया है। सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही’ के नाम से मशहूर सुरेंद्र अपने नाम के बिल्कुल विपरीत काम कर रहे हैं—वे विनाश नहीं, बल्कि पर्यावरण के संरक्षण और पुनर्निर्माण की मिसाल पेश कर रहे हैं।
अकेले अपने दम पर ब्यावरा की मैली और प्रदूषित अजनार नदी का कायाकल्प करने वाले इस छात्र के जज्बे को देखकर पूरा देश उनकी सराहना कर रहा है। शनिवार को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बिट्टू को अपने भोपाल स्थित शासकीय आवास पर आमंत्रित किया और उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव की खुलकर प्रशंसा की।
गणतंत्र दिवस से शुरू हुआ स्वच्छता का अनूठा महाअभियान
विज्ञान विषय में स्नातक (B.Sc) की पढ़ाई कर रहे सुरेंद्र सिंह चौधरी (बिट्टू) के माता-पिता स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं। इस वर्ष गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के अवसर पर उन्होंने अपने शहर को स्वच्छ बनाने का एक व्यक्तिगत संकल्प लिया।
शहर के बीच से गुजरने वाली अजनार नदी, जो लगातार कचरा फेंके जाने के कारण एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी थी, उसे बिट्टू ने अपनी कर्मभूमि बनाया। संक्रमण और स्वास्थ्य जोखिमों की परवाह किए बिना, बिट्टू बिना किसी आधुनिक संसाधन के नदी में उतरे और अपने नंगे हाथों से जमा हुआ ठोस कचरा, प्लास्टिक की बोतलें, पुरानी थैलियां और जलकुंभी निकालना शुरू कर दिया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात और 'जल गंगा संवर्धन' से जुड़ाव
बिट्टू के इस अनूठे प्रयास के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिससे न केवल देश के प्रमुख उद्योगपतियों का ध्यान इस ओर गया, बल्कि राज्य सरकार ने भी उनके इस प्रयास को गंभीरता से लिया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक व्यक्तिगत वीडियो साझा करते हुए बिट्टू को “ब्यावरा का बेटा” करार दिया। सीएम यादव ने लिखा कि बिट्टू ने अपने दृढ़ संकल्प से न केवल अजनार नदी को उसके मूल स्वरूप में लौटाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि यदि एक व्यक्ति ठान ले तो वह बड़े से बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
भोपाल में हुई आत्मीय मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने बिट्टू को राज्य सरकार की ओर से हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। इसके साथ ही, उनके इस स्वच्छता कार्य को राज्य सरकार के ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ से जोड़ा, जो जल निकायों के संरक्षण और जनभागीदारी को बढ़ावा देने के लिए चलाया जा रहा है।
जन-जागरूकता की कमी पर झलका 'बिट्टू तबाही' का दर्द
मुख्यमंत्री से बातचीत के दौरान बिट्टू ने अपनी खुशी जाहिर करने के साथ-साथ एक गहरी पीड़ा भी साझा की। उन्होंने बताया कि जिस नदी को साफ करने के लिए वे घंटों पसीना बहाते हैं, स्थानीय लोग उसमें दोबारा कचरा फेंक देते हैं।
बिट्टू ने दुख जताते हुए कहा:
“मुझे समझ नहीं आता कि लोग बार-बार नदी में कचरा क्यों फेंक देते हैं। मेरा एकमात्र उद्देश्य अपने शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना है। अब मैंने अपने इस अभियान को शहर के अन्य सार्वजनिक स्थलों तक ले जाने का फैसला किया है।”
नगर पालिका की नींद खुली, लेकिन नागरिक जिम्मेदारी अब भी चुनौती
‘ब्यावरा के बेटे’ के इस आत्मसमर्पण और जन-दबाव को देखते हुए स्थानीय नगर पालिका प्रशासन भी हरकत में आया। प्रशासन ने सड़कों और नालों के किनारे जमा कचरे के ढेरों को हटाने के लिए जेसीबी और पोकलेन मशीनें तैनात कीं।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी मशीनरी की मुस्तैदी के बावजूद आम जनता में नागरिक बोध (Civic Sense) और कचरा प्रबंधन की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि नागरिक अपनी आदतों में बदलाव नहीं लाएंगे, तो अजनार नदी के दोबारा प्रदूषित होने का खतरा बना रहेगा।
समाज के लिए प्रेरणा बने बिट्टू
सुरेंद्र सिंह चौधरी की यह कहानी दर्शाती है कि प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय जब एक आम नागरिक पहल करता है, तो पूरा तंत्र उसकी मदद के लिए आगे आता है। बिट्टू की यह मुहिम केवल अजनार नदी की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस युवा के लिए एक सीख है जो अपने समाज और पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव देखना चाहता है।








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