चीन के विकास से सबक के लिए भारत: 1980 में दोनों एक ही लाइन पर खड़े थे, भारत मंडल और कमंडल में उलझा हुआ था

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1980 के दशक में जब चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन की दिशा में अग्रसर किया, वहीं भारत सामाजिक सुधार और राजनीतिक गुटबाजी में उलझा रहा। उस समय भारत और चीन दोनों एक ही पथ पर खड़े थे, लेकिन चीन ने साहसिक फैसले लेते हुए अपने उद्योगीकरण को पूरी गति से आगे बढ़ाया, जबकि भारत मंडल आयोग की सिफारिश पर जाति आधारित आरक्षण और सामाजिक आंदोलनों में व्यस्त था।

चीन ने तत्कालीन माओ जेडोंग की नीतियों को छोड़कर, आधुनिक उदारीकरण की राह अपनाई। उन्होंने लाइसेंस व्यवस्था को पूरी तरह से सरल किया, प्राइवेट कंपनियों को बढ़ावा दिया और विदेशी कंपनियों के निवेश के लिए आकर्षक नीति बनाई। उदाहरण स्वरूप, अमेरिका की टेस्ला कंपनी को कारखाना लगाने में 3 साल लगने की योजना थी, लेकिन चीन ने मात्र 18 महीनों में पूरा कारखाना खड़ा करके विश्व को चौंका दिया। चीन ने अधिकारियों को जवाबदेह बनाया और पर्यावरण नियमों को लचीला बनाकर उत्पादन को प्रोत्साहित किया। वहीं भारत में लाइसेंस पाने के लिए महीनों लगते थे, और अधिकारियों की लापरवाही व भ्रष्टाचार आर्थिक विकास में रोड़ा बन गए।

इस समय भारत सामाजिक सुधार के नाम पर जाति व्यवस्था और धार्मिक उन्माद में उलझा रहा। मंडल आयोग की अनुशंसा पर आरक्षण को लागू करना जरूरी था, लेकिन उसके साथ-साथ देश की विकास दर पर ध्यान देना भी अत्यावश्यक था। दुर्भाग्यवश, राजनीति की दलबंदी ने विकास की गति को धीमा कर दिया। सामाजिक न्याय की लड़ाई में हम पीछे छूटते गए, जबकि चीन ने पूरी दुनिया के लिए बेजोड़ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया – चाहे वह हाई-स्पीड मैग्लेव ट्रेन हो, या हर साल नए पुल व सड़कें बनाना।

भारत ने औद्योगीकरण की बजाय गरीबी उन्मूलन को केंद्र बनाया, लेकिन सही मायने में गरीबी निवारण नहीं कर पाया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए, पर असल में उनकी आर्थिक स्थिति में बदलाव नहीं आया। जबकि चीन ने आर्थिक सुधारों से व्यापक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत की और हर क्षेत्र में तेजी से विकास किया। आज हर घर में चाइनीज सामान आम है, बुलेट ट्रेन की बात दूर की बात है, मैग्लेव ट्रेन चल रही है। भारतीय इंजीनियर मेहनती हैं, पर सिस्टम की जकड़नों ने उन्हें पीछे धकेल दिया।

इसलिए अब समय आ गया है कि हम चीन से सबक लें। आसान लाइसेंसिंग नीति अपनाएं, विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करें, सामाजिक मुद्दों के साथ-साथ औद्योगिक विकास पर भी ध्यान दें। यही वह रास्ता है, जिससे भारत वैश्विक शक्ति बन सकता है।

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