भोपाल में भिक्षावृत्ति प्रतिबंध बेअसर, एक महीने बाद फिर नजर आने लगे भिखारी

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भोपाल | भोपाल शहर में भीख मांगने पर प्रतिबंध लागू हुए अभी एक महीना भी नहीं बीता, और शहर की सड़कों पर भिखारी फिर से नजर आने लगे हैं। ट्रैफिक सिग्नलों, बाजारों, धार्मिक स्थलों और सड़क किनारों पर वे पहले की तरह नजर आने लगे हैं। इससे प्रशासन पर सवाल खड़े होते हैं की क्या इस प्रतिबंध को प्रभावी रूप से लागू कीया गया है, या यह भी पॉलीथीन और सिंगल-यूज प्लास्टिक प्रतिबंध की तरह महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है?


शहर के व्यापारियों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, शुरुआती दिनों में प्रशासन ने सख्ती दिखाई, जिससे भिखारी कुछ समय के लिए गायब हो गए थे, या ये कहें की वे कुछ दिनों की छुट्टी पर गए थे, और अब पूरे जोश में उन्होनें कमबैक कर लिया हैं। व्यवसायी अरिहंत गुप्ता कहते हैं, “भिखारी कहीं गए नहीं थे, वे बस इंतजार कर रहे थे कि प्रशासन कितनी गंभीरता से प्रतिबंध लागू करता है। कुछ समय बाद जब सतर्कता कम हुई, तो वे वापस आ गए। बाजारों और धार्मिक स्थलों के बाहर अब वे खुलेआम भीख मांगते नजर आ रहे हैं।”


प्रतिबंध के बावजूद भिखारियों को भीख मिल रही है


शहर के दुकानदारों के मुताबिक, प्रतिबंध के कारण शुरू में वे भीख देने से बचते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति बदल रही हैं। शिवाजी नगर के दुकानदार राकेश गुप्ता ने कहा – “शुरुआत में हमने भिखारियों को पैसे देने से इनकार कर दिया, लेकिन फिर वे खाने की मांग करने लगे। जब दुकान पर खाने-पीने का सामान भरा हो, तो उन्हें मना करना मुश्किल हो जाता है,” ।


इसी तरह, रमजान के महीने में मस्जिद के बहार भी भीख मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है। अब्दुल समद ने बताया कि “रमजान के दौरान लोग दान-दक्षिणा ज्यादा करते हैं। इस दौरान मस्जिदों के बाहर भिखारियों की भीड़ दिखना आम बात हो गई है।”


प्रशासन की रणनीति कमजोर?


भिक्षावृत्ति पर प्रतिबंध लागू करने के लिए जिला प्रशासन ने एक समिति बनाई थी, जिसमें सामाजिक न्याय विभाग के संयुक्त निदेशक आर.के. सिंह भी शामिल हैं। जब उनसे पूछा गया कि भिखारी फिर से सड़कों पर कैसे लौट आए, तो उन्होंने स्वीकार किया कि सतर्कता बनाए रखने में कठिनाइयां हैं। “जब हमारे कर्मचारी चौराहों पर निगरानी कर रहे थे, तब भिखारी गायब हो गए। लेकिन जैसे ही सतर्कता कम हुई, वे वापस आ गए।”


प्रशासन ने बेसहारा भिखारियों के लिए कोलार क्षेत्र में एक आश्रय गृह भी स्थापित किया है, लेकिन वहां फिलहाल सिर्फ सात भिखारी ही रह रहे हैं। इससे साफ है कि या तो भिखारियों को इस व्यवस्था की जानकारी नहीं है, या वे वहां जाने को तैयार नहीं हैं।


कानूनी कार्रवाई में बाधाएं


भिक्षावृत्ति रोकने के लिए पुलिस की भूमिका अहम हो सकती है, लेकिन यहां कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। आर. के. सिंह के अनुसार, “कानूनी तौर पर एफआईआर दर्ज करने के लिए हमें भिखारी और भीख देने वाले व्यक्ति, दोनों की तस्वीरें चाहिए। सिर्फ एक के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, जिससे कार्रवाई करना मुश्किल हो रहा है।”

क्या है आगे का रास्ता?


भोपाल में भिक्षावृत्ति पर प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए प्रशासन को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। जब तक सख्त और सतत निगरानी नहीं रखी जाएगी, तब तक यह प्रतिबंध सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह सकता है। साथ ही, भिखारियों के पुनर्वास के लिए ठोस उपाय किए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।


अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस प्रतिबंध को लेकर गंभीर कदम उठाएगा, या यह भी एक असफल प्रयास बनकर ही रह जाएगा?

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