इंदौर | इंदौर फैमिली कोर्ट का हालिया फैसला, जिसमें जैन दंपति की तलाक की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि जैन धर्म हिंदू धर्म से अलग है और जैन अनुयायी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत राहत नहीं पा सकते, कई संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े करता है। यह निर्णय उस समय आया है जब देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की चर्चा जोरों पर है।
इस फैसले में न्यायाधीश ने जैन नीति शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि जैनों की अपनी विवाह व्यवस्था है, जो हिंदू विवाह प्रणाली से भिन्न है। फैसले में यह भी कहा गया कि जैन धर्म हिंदू धर्म की मूलभूत वैदिक मान्यताओं को स्वीकार नहीं करता और इसे 2014 में अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा भी मिल चुका है। ऐसे में जैन दंपति हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की मांग नहीं कर सकते।
संवैधानिक प्रश्न और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
यह फैसला दो बड़े प्रश्नों को जन्म देता है। पहला, क्या यह निर्णय न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच UCC को लेकर एक मतभेद को दर्शाता है? दूसरा, क्या यह आदेश जैन पर्सनल लॉ को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक कदम हो सकता है?
इतिहास पर नजर डालें तो ब्रिटिश काल और उससे पहले जैन समुदाय ने अपने नीति शास्त्रों को न्यायालयों में प्रस्तुत करने का विरोध किया था, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि इससे उनकी धार्मिक पुस्तकों की पवित्रता भंग होगी। इसी कारण, जैनों के विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों को हिंदू कानूनों के तहत ही निपटाया जाने लगा। हालांकि, 20वीं शताब्दी में कुछ जैन विद्वानों ने जैन नीति शास्त्रों का अनुवाद कर उन्हें कानूनी रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया, लेकिन 1955-56 में इन्हें हिंदू कोड बिल में समाहित कर दिया गया।
UCC और धार्मिक अस्मिता के बीच संतुलन
इंदौर फैमिली कोर्ट का फैसला यह संकेत देता है कि यदि किसी समुदाय की विवाह और पारिवारिक परंपराएं हिंदू कानूनों से भिन्न हैं, तो उनके लिए एक अलग कानूनी ढांचा होना चाहिए। लेकिन यह फैसला समान नागरिक संहिता के विचार से टकराता है, जो सभी नागरिकों के लिए समान पारिवारिक कानून लाने की दिशा में काम कर रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या यह फैसला जैन समुदाय के लिए अलग पर्सनल लॉ की बहस को फिर से जीवित करेगा? यदि हां, तो क्या यह अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को भी अपने लिए अलग कानून की मांग करने के लिए प्रेरित करेगा?
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी गई है, और आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि उच्च न्यायालय इसे किस दृष्टिकोण से देखता है। यह मामला केवल एक तलाक की याचिका का नहीं, बल्कि भारत के कानूनी ढांचे और समान नागरिक संहिता की दिशा में उठाए जा रहे कदमों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। धार्मिक अस्मिता और कानूनी एकरूपता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।











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