अमेरिकी डॉलर दशकों से वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इस वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी है। ब्रिक्स देशों—चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका—ने डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इसका सबसे स्पष्ट संकेत उनकी बढ़ती सोने की खरीदारी से मिलता है।
चीन और रूस विशेष रूप से डॉलर के प्रभुत्व को कमजोर करने की रणनीति अपना रहे हैं। चीन ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज की हिस्सेदारी घटाकर सोने और अन्य मुद्राओं में निवेश बढ़ा दिया है। रूस, जो पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहा है, ने भी 2023 में भारी मात्रा में सोना खरीदा। भारत और ब्राजील जैसे देश भी इस प्रवृत्ति में शामिल हो गए हैं, जिससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव की संभावना प्रबल हो गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगाकर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की है, लेकिन चीन ने भी जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिया। इससे व्यापार युद्ध तेज हो गया है और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है। इसके साथ ही, ब्रिक्स देशों ने डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया है, जिससे अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को और झटका लग सकता है।
सोने की कीमतों में लगातार वृद्धि इस बदलाव का संकेत देती है। 2025 की शुरुआत में सोने के दाम नई ऊंचाइयों पर पहुंच गए, जो दर्शाता है कि निवेशक डॉलर की बजाय सोने को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कर्ज और व्यापार घाटे से जूझना पड़ सकता है।
इस परिदृश्य में अमेरिका के लिए यह चुनौती होगी कि वह अपने डॉलर के प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए कैसे रणनीति बनाता है। क्या वह नए आर्थिक उपाय करेगा, या फिर विश्व एक बहुध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ेगा? यह सवाल आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।











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