भारत की 18% वैश्विक आबादी के बावजूद, विश्व मैन्युफैक्चरिंग में उसकी हिस्सेदारी मात्र 2.8% है, जबकि चीन अकेले 28.8% का योगदान देता है। यह आंकड़े भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वास्तविकता उजागर करते हैं, जहां ‘मेक इन इंडिया’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाईं।
विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 2015 में 15.07% था, जो 2023 में घटकर 12.99% रह गया। सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन उनका प्रभाव नगण्य रहा। स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने की बजाय, भारत चीन से भारी मात्रा में आयात पर निर्भर होता जा रहा है। साइकिल, मोबाइल चार्जर, दवा निर्माण के लिए आवश्यक रसायन, और यहां तक कि छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी चीन से मंगवाए जा रहे हैं।
आर्थिक मोर्चे पर सरकार के बड़े दावों के बावजूद, जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘स्टैंड अप इंडिया’ जैसी योजनाओं का हश्र भी औसत से नीचे ही रहा। बेरोजगारी बढ़ी, और कुशल श्रमिकों का पलायन तेज हुआ। सऊदी अरब, दुबई, कनाडा और अमेरिका में रोजगार की तलाश में जाने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जो भारत में घटते अवसरों का स्पष्ट संकेत है।
विनिर्माण क्षेत्र की यह स्थिति भारत की आर्थिक नीतियों की विफलता दर्शाती है। भारत को यदि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहना है, तो उसे आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। केवल नारों और प्रचार से ‘मेक इन इंडिया’ सफल नहीं हो सकता, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाना होगा।











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