वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में व्यापार युद्ध (टैरिफ वार) ने एक नई चिंता को जन्म दिया है—विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की प्रासंगिकता और अस्तित्व पर संकट। हाल ही में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टैरिफ युद्ध ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। एक ओर अमेरिका अपने राष्ट्रहित की दुहाई देकर चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगा रहा है, तो दूसरी ओर चीन भी जवाबी कार्रवाई में पीछे नहीं है। इस प्रतिशोधात्मक नीति का प्रभाव न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, बल्कि पूरी दुनिया की व्यापारिक स्थिरता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है।
यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब WTO जैसी संस्थाएं इस विवाद में निष्क्रिय या अप्रभावी दिखाई देती हैं। WTO का मूल उद्देश्य देशों के बीच व्यापार विवादों का समाधान करना और वैश्विक व्यापार को मुक्त, निष्पक्ष एवं स्थिर बनाना है। किंतु जब दो बड़ी वैश्विक शक्तियां उसके नियमों की अनदेखी करते हुए टैरिफ लगाने की होड़ में लग जाएं, तब ऐसी संस्थाओं की भूमिका गौण होती नजर आती है।
अमेरिका ने चीन की 16 कंपनियों पर तकनीकी ट्रांसफर को लेकर रोक लगा दी है और चीन ने इसके जवाब में कई अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ा दिया है। दोनों देशों ने अब तक एक-दूसरे पर 50% से ज्यादा आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
इस टैरिफ युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि यदि अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं का पालन नहीं किया गया, तो भविष्य में ‘मजबूत की चलती है’ जैसी सोच को बढ़ावा मिलेगा, जिससे वैश्विक व्यापार एक बार फिर अराजकता की ओर लौट सकता है।
समय आ गया है कि सभी देश WTO को और सशक्त बनाएं, उसकी नीतियों का पालन सुनिश्चित करें और व्यापार युद्ध जैसे कदमों से बचें। वर्ना यह टैरिफ वार न केवल वर्तमान व्यापार संतुलन को बिगाड़ेगा, बल्कि विश्व व्यापार संधि की नींव को भी हिला सकता है।











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